प्रेरक उदाहरण
क्लेमेंट एटली की सरकार
ब्रिटेन · 1945–1951
राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा बनाई, लाखों सरकारी मकान बनाए और संसदीय वोटों के ज़रिए कोयला खदानें, रेलवे और इस्पात उद्योग सार्वजनिक स्वामित्व में लिए।
राजनीतिक विचारधारा गाइड
स्वतंत्र चुनावों के ज़रिए इस्पात, रेलवे, अस्पताल जैसे प्रमुख उद्योगों को सार्वजनिक स्वामित्व में लाएँ — ताकि उनका मुनाफ़ा सबके काम आए, न सिर्फ़ शेयरधारकों के।
क्या आप लोकतांत्रिक समाजवाद के समर्थक हैं?
मुफ़्त क्विज़ शुरू करें →एक ऐसे शहर की कल्पना कीजिए जहाँ बस कंपनी, कोयला खदान और अस्पताल — सब मिलकर शहर के लोगों के हैं, चुने हुए प्रतिनिधि उन्हें चलाते हैं और जो बचत हो वो सस्ते किराए, सुरक्षित खदानें और बेहतर वार्डों में जाती है — दूर बैठे शेयरधारकों की जेब में नहीं। यही लोकतांत्रिक समाजवाद है: बड़े उद्योगों का सार्वजनिक स्वामित्व, चुनी हुई सरकारों के ज़रिए तय किया हुआ।
लोकतांत्रिक समाजवादी सामाजिक लोकतंत्रवादियों से मात्रा में अलग हैं। सामाजिक लोकतंत्र ज़्यादातर निजी स्वामित्व बनाए रखता है और टैक्स व नियमों से लाभ फैलाता है। लोकतांत्रिक समाजवाद एक क़दम आगे जाता है — वे चाहते हैं कि राज्य या मज़दूर ऊर्जा, परिवहन, बैंकिंग, इस्पात जैसे प्रमुख क्षेत्रों के असली मालिक हों। पर यह स्वतंत्र चुनावों से होना चाहिए, क्रांति से नहीं।
ब्रिटेन की क्लेमेंट एटली सरकार (1945–1951) ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा बनाई और कोयले और रेलवे का राष्ट्रीयकरण किया। भारत में नेहरू ने सरकारी इस्पात कारखाने और IIT बनाए। नॉर्वे ने अपनी तेल संपदा एक सार्वजनिक कोष में डाली। तीनों दिखाते हैं कि यह विचार लोकतंत्र के भीतर काम कर सकता है।
ideoMap के चार पैमानों पर इसकी आम जगह।
प्रेरक उदाहरण
ब्रिटेन · 1945–1951
राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा बनाई, लाखों सरकारी मकान बनाए और संसदीय वोटों के ज़रिए कोयला खदानें, रेलवे और इस्पात उद्योग सार्वजनिक स्वामित्व में लिए।
प्रेरक उदाहरण
भारत · 1950–1960 का दशक
सरकार ने IIT, भिलाई और राउरकेला के इस्पात संयंत्र और बड़े बाँध बनाए। बुनियादी ढाँचे में सार्वजनिक निवेश ने आधुनिक भारतीय उद्योग की नींव रखी।
प्रेरक उदाहरण
नॉर्वे · 1990 से
तेल से होने वाली कमाई एक सार्वजनिक राष्ट्रीय कोष में जमा की गई। यह कोष अब दुनिया के सबसे बड़े संप्रभु संपदा कोषों में से एक है और भावी पीढ़ियों की पेंशन और सेवाओं के लिए पैसे देता है।
सबक़ देने वाला उदाहरण
वेनेज़ुएला · 1999 से अब तक
निजी कारोबार छीनने और अंधाधुंध नोट छापने से बाज़ार में सामान ख़त्म हो गया और लाखों लोगों को देश छोड़कर भागना पड़ा।
सबक़ देने वाला उदाहरण
श्रीलंका · 1970–1977
उद्योगों का राष्ट्रीयकरण और ज़्यादातर आयात पर पाबंदी से खाने की क़तारें, राशनिंग और भारी कमी हुई। अर्थव्यवस्था सिकुड़ने के बाद नीतियाँ पलट दी गईं।
जवाहरलाल नेहरू
भारत · 1889–1964
भारत के पहले प्रधानमंत्री जिन्होंने बड़े सार्वजनिक क्षेत्र उद्योगों, IIT और नियोजित विकास के साथ 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' बनाई — एक नवस्वतंत्र देश के लिए एक लोकतांत्रिक समाजवादी मॉडल।
राम मनोहर लोहिया
भारत · 1910–1967
समाजवादी विचारक और सांसद, जिन्होंने एक विशिष्ट भारतीय समाजवाद की दलील दी — नेहरू की ऊपर से नीचे की योजना और रूढ़िवादी मार्क्सवाद दोनों को चुनौती देते हुए — और निम्न जातियों व महिलाओं के अधिकारों की वक़ालत की।
क्लेमेंट एटली
ब्रिटेन · 1883–1967
ब्रिटिश प्रधानमंत्री (1945–1951) जिनकी सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा बनाई और संसदीय लोकतंत्र के ज़रिए ब्रिटिश इतिहास का सबसे व्यापक राष्ट्रीयकरण कार्यक्रम चलाया।
दोनों लोकतंत्र को मानते हैं और असमानता घटाना चाहते हैं, पर स्वामित्व पर असहमत हैं। सामाजिक लोकतंत्र ज़्यादातर उद्योगों में निजी स्वामित्व बनाए रखता है और टैक्स, नियमन व कल्याण से धन बाँटता है। लोकतांत्रिक समाजवाद चाहता है कि राज्य या मज़दूर प्रमुख उद्योगों के असली मालिक हों। व्यवहार में दोनों बहुत ओवरलैप करते हैं।
1976 में 'समाजवादी' शब्द प्रस्तावना में जोड़ा गया। लेकिन भारत हमेशा से मिश्रित अर्थव्यवस्था रहा है — निजी कारोबार और सार्वजनिक क्षेत्र साथ-साथ। संविधान के नीति-निर्देशक तत्व राज्य से असमानता घटाने और जीवन के पर्याप्त साधन सुनिश्चित करने को कहते हैं — जो पूर्ण सार्वजनिक स्वामित्व की माँग किए बिना समाजवादी चिंता दिखाता है।
इतिहास बताता है कि यह टिक सकता है, पर दबाव झेलता है। ब्रिटेन, नॉर्वे और भारत के कुछ हिस्सों में लोकतांत्रिक समाजवादी सरकारों ने लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक बराबरी दी है। चुनौती यह है कि राष्ट्रीयकृत उद्योग समय के साथ अकुशल हो सकते हैं और मतदाता बाद में ऐसी सरकारें चुन सकते हैं जो नीतियाँ पलट दें।
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मुफ़्त क्विज़ शुरू करें →ये उदाहरण सोचने में मदद के लिए आसान बनाकर लिखे गए हैं। इनका मक़सद किसी देश, पार्टी या लोगों की तारीफ़ या बुराई करना नहीं है।